Shloka - 1

 

  1. गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु
    गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।
    गुरु साक्षात् परम ब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः॥
    अर्थ: गुरु ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता), गुरु विष्णु (सृष्टि के पालक), और गुरु महेश्वर (सृष्टि के संहारक) हैं। गुरु स्वयं परम ब्रह्मा हैं, उन्हें मेरा प्रणाम।

  2. विद्या ददाति विनयं
    विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
    पात्रत्वाद्धानमाप्नोति धानाद्धर्मं ततः सुखम्॥
    अर्थ: विद्या विनय (नम्रता) देती है, विनय से पात्रता प्राप्त होती है। पात्रता से धन प्राप्त होता है, और धन से धर्म और सुख प्राप्त होता है।

  3. मातृ देवो भव
    मातृ देवो भव पितृ देवो भव।
    आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव॥
    अर्थ: माता को देवता मानो, पिता को देवता मानो। गुरु को देवता मानो, अतिथि को देवता मानो।

  4. सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत।
    अर्थ: सभी लोग शुभ देखे, कोई भी दुःख का भागी न बने।

  5. सप्तरश्मि सुतां प्राप्य
    सप्ताश्वरथिता वाणी कनककूटका रत्नम्।
    अर्थ: सप्ताश्वरथिता (सप्त रथों द्वारा परिवहन) और कनककूट (स्वर्ण की छांव) से प्राप्त रत्न के समान।

ये श्लोक जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षाओं और आदर्शों को व्यक्त करते हैं। संस्कृत में श्लोकों की यह विविधता और समृद्धि हमें गहन विचार और प्रेरणा प्रदान करती है।

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